Sunday, May 26, 2024
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story – ये कैसी सजा

“क्या हुआ बुआ जी.. अभी भी आपका शिल्पी दीदी को विदा करने का मन क्यों नहीं कर रहा है. बारात विदाई के इंतजार मे खड़ी है और आप हैं कि.. दीदी को ज्ञान दिए जा रही हो.. अंदर आते ही कमरे में अमन ने अपनी बुआ से कहा… सब दी..का बाहर इंतजार कर रहे हैं…

saja

 बस बेटा 5 मिनट और उसकी बुआ ने पल्लू से आंसू पौछते हुए कहा तो….तू समझ रही है ना शिल्पी….

 हां माँ हाँ..मैं आपकी सब बात ध्यान रखूंगी….वह भी रोए जा रही थी…बुआ जी अमन ने टोका तो…उस के पिता मोहन प्रताप उसे एक तरफ पकड़ कर ले जाकर बोले…. 10 मिनट और रुक जा बेटा वह मां है…उस ने क्या झेला हैkaisi saja pae hai tu to janta hai na …इसलिए आज वो शिल्पी को उन बातों से बचा रही है….

 वैसे तो करण बहुत अच्छा लड़का है…और मैंने उसे सब कुछ बता दिया है पढ़ा लिखा समझदार लेकिन,बेटा कब क्या हो कुछ पता नहीं है….वहां सब को इज्जत सम्मान देना…

  वैसे ऊपर वाले से यही दुआ करुंगी कि जो मेरे साथ हुआ वह कभी किसी के साथ ना हो...बेटा हमेशा समझ से काम लेना समझने की पूरी कोशिश करना…

 आपकी कोई गलती नहीं थी मां..उसने उन के आंसू पोछते हुए कहा.. आपने तो बिना गलती की सजा पाई…

 आप सच कह रही है दीदी…कहते हुए अमन रो सा हो गया..

 बिना जवाब दिए मंजरी रो रही थी और शिल्पी को समझा रही थी.. हर घर में कभी कदार कहा सुनी हो जाती है… कभी झुक जाना कभी समझा लेना.

 और कभी झुका भी लेना… मम्मी जी करण ने जो उनकी बातें सुन चुका था…मुस्कुराकर अंदर आकर बोला…..आप चिंता ना करें जो हो चुका है भूल जाएं… मम्मी जी….

 यकीन मानिए मेरी सोच बहुत अलग है मैं अपनी गलती से बचूँगा..गलती होने पर शिल्पी के आगे खुद को  झुका लूंगा… वैसे भी शिल्पी को आपने इस तरह से पाला है कि समझदारी उसके अंदर भरी पड़ी है खुद मम्मी इसकी तारीफ कर थी और वह अभी से ही खुश भी हैं.

  करण ने शिल्पी की मां का हाथ अपने हाथों में ले लिया…अब कोई चिंता ना करें न हीं डरें मम्मी जी…

  अब हमें आशीर्वाद दीजिए करण शिल्पी ने झुककर उनके चरण छुए… कुछ ही देर में बारात विदा होकर चली गई और वह शिल्पी को जाता देखती रही…

  तभी मोहन प्रताप ने उसे एक ग्लास पानी देकर वही पास पड़ी चेयर पर बिठाया…

  क्यों चिंता करती हो दीदी सब ठीक होगा हम सब है ना तुम्हारे साथ….

हां जीजी हम सब आपके साथ हैं भाभी बोली थी…..

 अमन और रिया को (रिया अमन की पत्नी थी) कुछ दिन के लिए आपके पास छोड़ देते हैं और हम शाम को निकल जाएंगे..

 चलो सब तैयार हो जाओ होटल खाली करना है अमन ने आकर सबको बताया तो सब अपना सामान रखने लगे.

 दोपहर में सब होटल से घर पहुंच चुके थे मोहन प्रताप उसकी पत्नी मीना और भाई बहन सब शाम को विदा कर दिए गए..

 अब घर में सिर्फ अमन रिया और मंजरी रह गए थे.

 मंजरी अपने कमरे में चेयर पर बैठी थी. रिया ने खाने की पूछी तो उसने मना कर दिया तो रिया उसकी मनपसंद कॉपी और कुछ स्नैक्स जबरदस्ती दे गई.

 शिल्पी एकलौती संतान थी उसकी..उसे याद करके वह रोए जा रही थी.

 दिल में तमाम दर्द और घाव थे.. मंजरी ने माता-पिता बनकर आज उसे विदा किया था और पिता मनन….उसने तो पलट कर भी नहीं देखा था कभी… सोच रही थी वह यह कैसी  सजा थी जो बिना कसूर के उसे मिली थी…

 रोते-रोते ख्यालों में पहुंच चुकी थी मंजरी….

 उसकी शादी को 27 साल बीत चुके थे और डिवोर्स हुए पूरे 25 साल अच्छे से याद आ रहा था उसे सब कुछ…

 यह बिल्कुल  ठीक नहीं है मां … तुम दीदी की जगह मेरी शादी मनन से कर दो.. मंजरी कमरे में खड़ी अपनी मां के ऊपर चिल्ला रही थी..

 यह ठीक है मंजरी… मैंने मनन के घरवालों से बात कर ली है वह भी तेरे लिए तैयार है कह रहे थे हमें तो अपनी इज्जत रखनी है और हमें भी अपनी इज्जत रखनी है…मंजरी की मां बोली…कार्ड बट चुके हलवाई लग चुका है सारे रिश्तेदार आ चुके हैं..सब कुछ तैयार है तू ही बता क्या करूं…

 ऐसी स्थिति में सृष्टि ने धोखा दिया है अगर वह पहले बता देती तो…

 मैंने बताया था ना तुमने सुना कहां….तुमने तो 8 दिन में सारी तैयारी कर ली… कमरे में आते ही सृष्टि बोली..

 हमारे पास पैसों की कमी थोड़ी है उनका पैसो का घमंड बोल रहा था जो हम तैयारी ना कर सके लड़का जो अच्छा था. उन्होंने सफाई दी.

 सब तेरे कारण हो रहा है… मंजरी ने सृष्टि पर चिल्ला कर कहा.. अगर तूने पहले ही शादी कर ली थी तो फिर यह सगाई शादी  का ढोंग क्यों रचाया..

  मैंने तो सोचा था कि सगाई तो करके तोड़ी जा सकती है. मां को समझा लूंगी.. मैं और समर कोट मैरिज कर चुके हैं..हम एक दूसरे को चाहते हैं पढ़ाई खत्म होते ही जॉब लग जाती तो सबको बता देती….

  लेकिन अपने चक्कर में तूने यहां सब उल्टा कर दिया… मंजरी झुंझला कर कर बोली..

  गलती मां की है इतनी जल्दी बिना समझे शादी की पूरी तैयारी कर ली सिर्फ 8 दिन के लिए ही मैं बाहर क्या गई… माँ ने पूरी तरह शादी की तैयारी करके रख ली.

  मैं यह शादी नहीं कर सकती मां पढ़ाई बीच में छूट जाएगी.. मेरे भविष्य का क्या होगा….

  मैं मनन को नहीं जानती ना उसके.. घर वालों को.. सब कुछ अचानक नहीं माँ नहीं मुझे बक्शो…उसने हाथ जोड़े..

  कहकर वो जाने लगी तो पिताजी अंदर आ गए उन्होंने मंजरी का हाथ पकड़ कर रोक लिया और दोनों मां-बाप रोने लगे..

  अभी मनन के पिता प्रताप जी का फोन आया है कह रहे थे कि शादी होना बहुत जरूरी है अगर यह शादी नहीं हुई तो किसी को क्या मुंह दिखाएंगे उन्होंने रिश्ते नातेदारों में भी फिलहाल यह बात छुपा ली है की अब शादी सृष्टि  से नहीं उसकी छोटी बहन से हो रही है…

  वरना 100 प्रश्न पूछेंगे सब…

  मैंने कहा बाद में क्या होगा तो… वह बोले बाद की बाद में सोचेंगे पहले इस स्थिति को संभाल लें..पर अगर यह शादी नहीं हुई तो सारी इज्जत धूल में मिल जाएगी..

 हमारी लाज रख ले मंजरी… मां पिताजी ने हाथ जोड़ दिए..

  यह शादी तू कर ले…

  पर माँ तुम समझती क्यों नहीं हो अचानक से इतना बड़ा फैसला कैसे ले लूं मैं… यह कैसी सजा दे रही हो मां..

  फैसला तो लेना ही होगा और कोई चारा नहीं है मोहन प्रताप उसका भाई जो मंजरी से एक साल छोटा था आकर बोला …

   देखो मां सृष्टि की शादी का किसी को कुछ पता नहीं है उसे ही मना लो शादी के लिए.. मंजरी बोली

    पागल हो गई है क्या मां बोली ऐसा होता है… क्या कभी

    किसे मना लो दीदी आप सब बातों में इतने मशगुल हैं कि सृष्टि दीदी चुपचाप बैग निकालकर कब का यहां से जा चुकी हैं

    अभी कुछ देर पहले ही उन्हें मैंने मोटर साइकिल पर सवार एक लड़के के साथ जाते हुए देखा है..

    मैं कुछ पूछता समझता इससे पहले ही बिना बोले निकल गई किसी को कुछ पता नहीं है उनके बारे में.. यानी कि वो यहां से चुपचाप भाग चुकी हैं.

    हे भगवान मंजरी रो पड़ी..

    क्या हो गया है यह सब क्या कर दिया इस सृष्टि ने वो रोए जा रही थी….

    रोने धोने से कुछ नहीं होगा चुप हो जाओ दोनों..पिता ने अपने आंसू पूछते हुए कहा.. क्या होगा क्या नहीं सब बाद में देखेंगे…

  पहले इज्जत संभालो एक इज्जत उतार कर चली गई और दूसरी इज्जत ही नहीं कर रही है..

     पिताजी… मंजरी गुस्सा हो गई मेरी इसमें क्या गलती है.

     यह सब तेरी मां का किया धरा है बहुत जिद्दी औरत है यह वह गुस्सा होकर बोले इसी के लाड प्यार और पैसे के घमंड ने सब बिगाड़ा है सृष्टि को भी इसने बिगाड़ा है..

     मैंने ऐसा क्या गलत कर दिया मंजरी की मां बोली..

     चुप रहो तुम इसी में इस समय तुम्हारी भलाई है और इसे तैयार करवाओ कहकर वह गुस्से में पैर पटकते हुए बाहर चले गए..

     मां प्लीज रोक लो यह शादी… मत दो मुझे सजा…मंजरी ने रोते हुए हाथ जोड़ें…

     यह नहीं हो सकता मंजरी उन्होंने मंजरी को समझाया. तू मेरी बहुत अच्छी बच्ची है सारी स्थिति तुझे पता है बेटा हमारी इज्जत रख ले बेटा वरना सारे समाज में हमारी थू थू हो जाएगी.

     मामी नानी मौसी सभी रिश्तेदार आ गए थे अंदर कमरे में.. सभी समझाने लगे स्थिति की सबको पता चल चुकी थी आखिर में मंजरी ने हां कर दी..

  मंजरी और मनन की शादी बहुत धूमधाम से हुई. सारे रिश्तेदार वाह-वाह कर रहे थे..उधर सृष्टि सदा के लिए जाने कहां जा चुकी थी और इधर मंजरी मनन के घर बहू बनकर घर में प्रवेश कर चुकी थी.

    मनन के यहां पैसों की कोई कमी नहीं थी.. मनन ने उसका हर तरह से ख्याल रखा था किसी चीज की कमी नहीं होने दी थी…

    मनन तीन भाई बहन थे कारोबार बहुत अच्छा था तीन फैक्ट्री थी जो वह अपने पिता के साथ मिलकर चलाता था.

     मनन से 3 साल छोटा भाई चमन और उसकी छोटी बहन परी.

    परी मां-बाप और भाइयों की बहुत लाडली थी जिद्दी और घमंडी वह चमन से 5 साल छोटी थी..

    सबसे छोटी और दुलारी होने के कारण गुस्सा नाक पर रखा रहता था उसकी गलती होने के बाद भी कोई उससे कुछ नहीं कह सकता था चमन भी कम नहीं था उसे तो कभी-कभी डांट पड़ जाती थी लेकिन परी को कोई कुछ नहीं कहता था..

    अक्सर वो और चमन कुछ ना कुछ मंजरी पर इल्जाम लगा देते थे और मंजूरी चुप रहती थी सास भी बच्चों का पक्ष लेती थी और मनन बच्चे हैं कह कर टाल देता था.

    4 माह बाद खुशखबरी मिली कि मंजरी प्रेग्नेंट है उस दिन मनन बहुत खुश था…

    शाम के समय परी कहीं जा रही थी और इधर से मंजरी चाय की ट्रे लेकर अपने कमरे में जा रही थी.दोनों एक दूसरे से टकरा गए सारी चाय परी के कपड़ों पर गिर पड़ी पड़ी… परी ने आव देखा ना ताव गुस्से में मंजरी को धक्का दे दिया.

    और जोर-जोर से चिल्लाने लगी पूरा घर इकट्ठा हो गया… मंजरी जमीन से उठने की कोशिश कर रही थी मनन समझ गया था उसने मंजरी को सहारा देकर उठाया. परी ने मां के आते ही मंजरी पर चाय जबरदस्ती गिराने का इल्जाम लगाकर खूब डांट पड़वाई…

    उस दिन सास ने उसे बहुत बुरा भला कहा वह नौकरों के सामने ही डांट रही थी पर मनन की हिम्मत कुछ कहने की नहीं हुई थी..रोते हुए मंजरी अपने कमरे में चली गई…

    तुम इतना दिल पर ना लो मनन ने उसे प्यार से समझाया.

    मेरी गलती नहीं थी मंजरी ने कहा.

    कोई बात नहीं हो जाता है परी अभी बच्ची है बड़ी होकर सब ठीक हो जाएगा.

    और चमन उसने पूछा

    वह भी हो जाएगा वह हंसकर बोला सुनो शाम को चाचा जी के बच्चे तुमसे मिलने आ रहे हैं तुम अच्छे से तैयार होकर और अच्छा सा खाना तैयार कर लेना.

     पर मनन मेरे कमर में बहुत दर्द है गिरने से लगता है चोट लग गई है..

      लाओ मैं तुम्हारे बाम लगा देता हूं उसने उसके बाम लगाई तो कुछ राहत मिली…

      अब कैसा लग रहा है कुछ आराम आया..

      हां वो मुस्कुराई तो मनन उस के करीब आ गया तभी माँ ने उसे आवाज लगा दी तो वह हंसकर बाहर चला गया….

      शाम को चाचा जी के बच्चे आ चुके थे सभी ने मंजरी के हाथ का बना खाना खाया तो सभी उसके खाने की और उसकी खूबसूरती की तारीफ कर रहे थे..

      यह सब परी को सहन नहीं हो रहा था उसने नमक कम है कहकर सब्जी की कटोरी जमीन पर दे मारी…

      सास की भौ चढ़ गई सास ने परी से कुछ ना कहकर सबके सामने मंजरी को ही बुरा भला कहा…

      मनन में मां को समझाना चाहा तो वह उसी पर इल्जाम रखने लग गई…

      चाचा जी के बच्चे चले गए मनन और मंजरी कमरे में आ चुके थे.. मंजरी ड्रेसिंग टेबल के पास बैठी चूड़ी उतार रही थी मनन ने पीछे आकर पूछा…..क्या सोच रही हो….

      मंजरी ने कोई जवाब नहीं दिया मनन समझ चुका था कि मंजरी नाराज है वह उसे समझाने लगा..

      अब भूल भी जाओ सब मनन बोला

      भूल ही तो जाती हूं पर गलती क्या है मेरी. किस बात की सजा है यह .. तुम सब कुछ देखते रहते हो कुछ बोलते तो नहीं हो…

      तो तुम्हारा मतलब है मैं तुम्हारे लिए अपने घर वालों से लडू..वह थोड़ा गुस्से में बोला..

      मैंने ऐसा तो नहीं कहा…मंजरी ने कहा

      फिर कहना क्या चाहती हो..

      समझा तो सकते हो समझ भी सकते हो कि परी और मम्मी जी का मेरे प्रति क्या व्यवहार है ऊपर से चमन भैया भी सुनाने से नहीं चूकते हैं..

      तुम भी क्या लेकर बैठ गई आज तुम्हें मूवी दिखा लाता हूं उसमें टॉपिक बदलने की कोशिश की…

      मेरा मन नहीं है पहले मेरी बातों का जवाब दो…मंजरी बोली

      मैं तो तुम्हें चाहता हूं ना इतना तो तुम महसूस करती हो ना धीरे-धीरे सब ठीक हो जाएगा मनन ने समझाने की कोशिश की..

      मंजरी सब समझ रही थी कि मनन घर की बातों से बच रहा है माँ से वह कुछ नहीं कहेगा. क्योंकि वो खुद मनन को सुनाने में सबसे आगे रहती थी पर मनन मां के सम्मान के कारण चुप रहता था. गलतियां देख कर भी उसे किसी को गलत कहने का साहस नहीं था.

      3 माह और बीत गए घर में बिना बात का तनाव था रिश्तो की कदर ना थी उस घर में… मंजरी के रूप में बहू और भाभी की नहीं एक नौकरानी की जरूरत थी.

      मंजरी अपनी सारी जिम्मेदारियां निभा रही थी फिर भी सास परी चमन को शिकायत कुछ ना कुछ बनी रहती थी…

      ससुर और मनन खुश थे पर सास के आगे वह भी नहीं बोलते थे…

      प्रेगनेंसी के कारण मंजरी को थकान हो जाती थी.. दोपहर का वक्त था मंजरी सब को खाना खिला कर अपना और मनन का खाना लेकर अपने कमरे की ओर जा रही थी…

      तभी चमन और परी ने जान बूझकर जमीन पर पानी फैला दिया मंजरी का पैर फिसला और खाने की थाली  हाथ से छूट कर गिर गई और वह एक और जा गिरी.

      आवाज सुनकर सब बाहर आ गए शिल्पी एकदम क्रोध से भर गई..परी और चमन हंस रहे थे उसने उनको भला बुरा कहना शुरू कर दिया…

      सास और मनन मंजरी पर चिल्लाने लगे…

      अंधी है क्या देख कर नहीं चल सकती… सास बोली

      मेरी गलती नहीं है मम्मी जी सब परी ने किया है जानबूझकर

      फिर इल्जाम…परी बोली

 मैं सच कह रही हूं मम्मी जी मंजरी ने कहा…

 तू हर समय सच कहती है बाकी सब झूठ बोलते हैं… सास ने गुस्से में एक थप्पड़ मंजरी को जड़ दिया..

 मम्मी जी…मंजरी सकपका गई सच में मेरी गलती नहीं है..

 देखा देख रहा है ना कितना जवाब देती है माँ ने मनन को घूर कर कहा… खुद चुपचाप खड़ा देख रहा है नालायक जोरू का गुलाम वो चिल्ला पड़ी….

 मां परी की गलती लगती है मनन ने कहना चाहा तो…

 हां हां क्यों नहीं अब तो तुझे इसके कारण सब गलत ही दिखेंगे निर्लज्ज….

  मनन बोला..ऐसा मत कहो….

  क्या बात हुई है मनन ने पूछा

  मंजरी ने सारी बात बता दी कि कैसे गिरी परी के कारण

  अरे तुम छोड़ो परी को… वह उसका हाथ पकड़कर खींचने लगा अंदर कमरे में चलो…

  नहीं मैं नहीं जाऊंगी.. हर जगह बिना बात मुझे गलत मत ठहराओ 

  मैं कहता हूं अंदर चलो…मनन गुस्से से बोला

  नहीं पहले  फैसला करो…

 जवान लड़ाती है कहकर गुस्से में मनन ने भी मंजरी को एक झन्नाटेदार थप्पड़ रसीद कर दिया.

 बस यही गजब हो गया था क्योंकि उसी वक्त  मंजरी के माता-पिता उससे मिलने आए थे…वह दरवाजे पर खड़े सब देख रहे थे यह किसी को पता नहीं था…

मां गुस्से में आगे बढ़कर आई और मंजरी को खींचकर गले लगा लिया मंजरी अचानक मां को देखकर गले लग कर रो पड़ी उसकी यह हालत देखकर उनकी आंखें भरी आई.

 इसी दिन के लिए आपने हमसे मंजरी का हाथ मांगा था कि हमारी इज्जत रख दो और आज मंजरी का यह हाल..  पिताजी बोले..

 कहना क्या चाहते हैं आप.. सास चीख कर बोली बेटी आपकी भागी थी मेरा बेटा नहीं…इज्जत तो खुद की भी दांव पर लग रही थी यह क्यों भूल गए..

 बस बहन जी बस बेहतर होता इन सब बातों की बजाय आप परी और चमन को समझाती बैठ कर…देखती गलती किसकी है..

 मुझे मेरे ही घर में लेक्चर मत दो सास ने दोनों से गुस्से में कहा ले जाओ अपनी बेटी को यहां से….

 यह क्या कह रही हो मां तुम मनन ने कहा…

 तू चुपचाप अपने कमरे में चला जा वरना..इसे ले जा चमन यहां से.. चमन जबरदस्ती भाई को घसीटते हुए ले गया…

 ले जाएंगे अपनी बेटी को हम..हमारे यहां रोटियों की कमी नहीं है मां बोली चलो यहां से ऐसे घर में हमें अपनी बेटी नहीं छोड़नी है.

 मां पिताजी जबरदस्ती मंजरी को ले गए मनन कमरे में से देखता रहा पर उसने उसे रोकने की बिल्कुल कोशिश नहीं की..

 मंजरी मायके आ गई…

 मंजरी ने फोन किया मनन ने फोन नहीं उठाया 3 दिन बाद उसका फोन आया….

 पूछोगे नहीं की कैसी हो मंजरी ने पूछा..

 तुमने मुझसे जाने से पहले पूछा था क्या..मनन ने उल्टा प्रश्न किया

 तो अभी भी मेरी ही गलती दिख रही है…

 हां हां तुम्हारी ही गलती है तुम ही परी से लड़ती हो वह बच्ची है तुम तो बड़ी हो..

 और मम्मी जी वह भी बच्ची हैं..

 जवान मत लड़ाओ वह चेत गया..

 क्या तुम यहां आ सकते हो मेरी तबीयत बहुत खराब है मंजरी ने पूछा..

 बिल्कुल नहीं..एकदम निष्ठुर बन गया था… मैं बिल्कुल नहीं आने वाला तुम यह भी ना सोचना कि मैं तुम्हें बुलाने आऊंगा जैसे गई हो वैसे आ जाओ वरना तुम्हारी इच्छा…

 मनन यह तुम कह रहे हो या मम्मी जी कह रही हैं…

 कुछ भी समझ लो कह कर उसने फोन काट दिया..

 वह मनन के स्वभाव को जान चुकी थी वह मां के कहने में चलता था…वह जैसा चाहती थी वैसा ही वह करता था.. वह अपनी तरफ से कुछ समझना नहीं चाहता था.उसने मनन को फोन करने की कोशिश की तो इधर माँ ने उसे फोन करने से साफ मना कर दिया…

 मंजरी को समझ नहीं आ रहा था क्या करें पूरे दिन चल रहे थे ना तो मनन आया न ही ससुराल वालों ने खबर ली पता नहीं क्या हो रहा था उसकी जिंदगी में… सोच रही थी कि किस बात की उसे सजा मिल रही है वह भी बिना कुसूर किए.

 इधर माँ ने भी हिदायत दे दी थी कि अगर मनन लेने नहीं आया और वह खुद जाती है तो उनका मरा मुंह देखेगी…

  उसे मनन पर बहुत गुस्सा आ रहा था…

 3 दिन बाद शाम के समय शिल्पी का जन्म हुआ… खबर ससुराल पहुंचा दी गई पर कोई नहीं आया 15 दिन बाद मनन आया तो उसके हाथ में कागज लग रहे थे..

 ना तो उसने मंजरी का हाल पूछा ना ही अपनी बेटी गोद में ली सीधा उसे कागज पकड़ा दिया…

 क्या है यह मंजरी ने पूछा..

 डिवोर्स पेपर हैं इसमें साइन कर दो

 पागल हो गए हो मंजरी ने झुंझुला कर कहा…. कैसे बाप हो तुम अपनी बच्ची को देखा तक नहीं मुझसे कुछ पूछा नहीं और यह सब…

 मैं यहां कुछ पूछने देखने नहीं आया हूं सीधे-सीधे सिग्नेचर करो और यहां से मुझे जाने दो तुम्हें और तुम्हारी बेटी को हर महीने खर्च मिलता रहेगा तुम चिंता मत करो..

 अरे उसे चिंता की क्या जरूरत है…. मां आ चुकी थी वह मेरी बेटी है तुम्हारे यहां कभी नहीं जाएगी ..  चले जाओ यहां से हम कोर्ट में मिलेंगे मनन कुछ बोले बिना वहां से चला गया…

 1 साल बाद मंजरी का तलाक हो गया उधर सुनने में आया कि मनन की मां ने मनन की दूसरी शादी कर दी…

 इधर मंजरी अपने मायके वालों के साथ शिल्पी को पालने में लग गई उसने अपनी छुटी हुई पढ़ाई पूरी की..

 ऐसा नहीं था कि उसके लिए रिश्ते नहीं आए मां ने कोशिश की पर बात नहीं बनी कोई उसे शिल्पी सहित अपनाने को तैयार नहीं था तो कोई शिल्पी को साथ रखने की बजाय बोर्डिंग में रखने की बात के लिए तैयार था…

 मंजरी शिल्पी को छोड़ने को तैयार नहीं थी शिल्पी ही उसकी जान और जिंदगी थी…

 मंजरी ने घर में साफ मना कर दिया कि उसे शादी नहीं करनी है पढ़ाई पूरी करने के बाद एक स्कूल में प्रिंसिपल के पद पर आसीन हो गई…

 रहने और खाने की व्यवस्था ऊपर वाले ने उसके लिए कर दी थी वह यही सोच कर संतुष्ट थी..

 दिन बीतते गए शिल्पी की पढ़ाई पूरी हुई… इसी दौरान माता पिता जी दोनों गुजर गए… शिल्पी मंजरी के लिए जान दिए रहती थी..

उसे मनन के नाम से बहुत चिढ़ थी… 

 उसके लिए मंजरी ही उसकी मम्मी पापा थी बाकी कोई भी नहीं मनन की तो वह शक्ल भी नहीं देखना चाहती थी..

 पूरे घर ने मंजरी और शिल्पी को अपना लिया था.. सभी उसकी जरूरत पर उसकी मदद करने के लिए आ जाते थे..भाई भाभी भतीजी भतीजे सभी अच्छे पढ़े लिखे और समझदार थे… सभी समझते थे उसको…

 मंजरी कभी किसी पर बोझ नहीं बनी….

 करण का रिश्ता भाई मोहन प्रताप ने हीं तय किया था करण और करण के घरवालों को सब बता दिया गया था कुछ नहीं छुपाया गया था…

  मंजरी ख्यालों में खोई थी तभी फोन बजा देखा तो शिल्पी का फोन था वह बहुत खुश हुई रिया और अमन भी आ गए दोनों उसी के पास बैठ गए थे..

 कैसी हो मां शिल्पी की आवाज में खुशी थी..

 अच्छी हूं बेटा सब अच्छे से पहुंच गए हैं…

 हां मम्मी जी सब अच्छे से पहुंच गए हैं करण चिल्लाकर बोला आप चिंता मत करना मैं हूं ना अब शिल्पी के लिए….

 यह सुनकर मंजरी अमन रिया का चेहरा खुशी से खिल गया मंजरी ने अमन और रिया को खुशी से गले लगा लिया.. अजीब सी संतुष्टि मिल रही थी आज उसे…

 1 साल बीत गया शिल्पी ने बेटे को जन्म दिया…आज करण शिल्पी और बेटे को.. अपने मम्मी पापा और भाई बहन के साथ मंजरी के पास मिलाने लाया था… सब घर आए हुए थे सभी बहुत खुश थे… करण पागलों की तरह बच्चे को लेकर खिला रहा था.. शिल्पी भी बहुत खुश थी….

 कुछ पल के लिए मंजरी को वह पल याद आया जब मनन शिल्पी के जन्म के बाद घर आया था पर उसने उसे देखा भी ना था…

 उसका मन कड़वाहट से भर रहा था उसने मनन की तस्वीर निकाल कर जो उसने संभाल कर रखी हुई थी कचरे में डाल दी..

 मोहन प्रताप जो मंजरी की भावनाओं को समझ रहा था उसने तुरंत नौकर को बुलाकर कर उस तस्वीर को बाहर फेंक देने की कही….

 और मंजरी को सबके बीच में ले गया ताकि वह उन खुशियों को जी सके….

  आपको मेरी लिखी ये स्टोरी कैसी लगी कृपया कमेंट जरुर करें

 धन्यवाद!!!!! 🙏🙏🙏🙏🙏

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